फिल्म समीक्षा
दो बीघा जमीन
दो बीघा जमीन फिल्म यह लोगों के जीवन और समाज के हालात को दर्शाती है यह फिल्म बदलते वक़्त और बदलते भारत के बारे में बताती हैं।
यह फिल्म 1953 में अयी थी इसके निर्माता निर्देशक बिमल रॉय जी है। फिल्म का मुख्य कीरदार एक समभू नाम के किसान का हैं जिसकी जमीन हड़प कर एक गांव का बड़ा जमीनदार उस पर मील बनना चाहता है।
समभू कोअपनी जमीन बचाने के लिए पैसे की जरूरत होती है वह पैसे जुटाने के लिए गांव से बाहर निकल कर कोलकाता चाला जाता है। वहां पर वह हाथ वाला रिक्शा चालाना शुरू करता हैं।
यह फिल्म रवीन्द्र नाथ टैगोर जी की कविता दूई बिघा
जोमीन से प्रेरित होकर इसका नाम रखा गया हैं।
किरदार,,
समभू का किरदार निभाने वाले बाल शाहनी जी थे।
समभू की पत्नी का किरदार निभाने वाली जानी मानी
अभीनेत्री नीरुपा रोय थी।
बेटे के किरदार में नजर आते मास्टर रत्न कुमार।
समभू के पिता के किरदार में दिखने वाले नाना पलसीकर ।
बूट पॉलिश करने वाले के किरदार में दिखें जगदीश
और कुछ सीन में महमूद भी नजर आये जिन्होंने आगे चलकर हिंदी फिल्मों में बहुत नाम कमाया।
फिल्म में चार चांद लगाने मीना कुमारी ने।
फिल्म में गाने भी कमाल के थे गीतकार शैलेन्द्र जी के लिखें और गानों को भी कमपोस किया था। इस फिल्म ने लोगों का दिल जीतने के साथ साथ इंटरनेशनल फेस्टीवल में भी पुरुस्कार जिते ।
भारत में रचे गये फिल्म सरमनी में सबसे पहले इसे पुरुस्कार मिला।
विमल दा को बेस्ट अवोड 160साल के बाद भी यह फिल्म कई किसानों के जीवन को प्रेरित करती है यह भारत के इतिहास को दर्शाती हैं।
यह किसानों के वास्तविक जीवन को बड़ी गम्भीरता से दिखाया गया हैं।
धन्यवाद✍️
अंजना यादव
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