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Showing posts from September, 2020

आज फिर दरिंदगी का शिकार हुयी एक बेटी जिंदगी की जंग हार गरयी😞😞

हम स्वयं ही एक छोटा सा प्रयास करके रेप पीड़ित लड़कियों को इंसाफ दिलाने का प्रयास करें सरकार को ऐसे दरिंदों को फांसी की सजा नहीं दी जानी चाहिए उन्हें न मरने न जीने दिया जाय ऐसी सज़ा सुनाई जाये  की आगे कभी मासूम बच्चीयो को लेकर अपने मन में विचार भी न लाये(जाती नीची होने कारण ही रेप करना है) छोटी जात नहीं लोगों की छुट्टी सोच है। अब हर एक बेटी को रिवोल्वर उठा लेनी चाहिए सरकार वजह पूछे तो बोल दो अब बेटी ्् की सुरक्षा तुमसे नहीं हो पायेगी अब बेटी को स्वयं अपनी रक्षा करनी होगी!,✍️✍️🙏🙏🙏 💃💃              धन्यवाद 🖕✍️

२८/९/२० सहीद भगत सिंह जयंती

'दिल से निकलेगी न मर कर भी वतन की उल्फ़त, मेरी मिट्टी से भी ख़ुशबू-ए-वफ़ा आएगी', आज का दिन लाल चन्द फ़लक के इस शेर को गुनगुनाते हुए आजा़दी के एक ऐसे मतवाले को याद करने का दिन है जिसके लिए आजा़दी ही उसकी दुल्हन थी. आज का दिन ज़मीन-ए-हिन्द की आज़ादी के लिए हंसते हंसते फांसी पर चढ़ जाने वाले उस परवाने को याद करने का दिन है जिसके ज़ज्बातों से उसकी कलम इस कदर वाकिफ थी कि उसने जब इश्क़ भी लिखना चाहा तो कलम ने इंकलाब लिखा. आज का दिन शहीद-ए-आजम भगत सिंह को याद करने का दिन है. भगत सिंह भारत मां के वही सच्चे सपूत हैं जिन्होंने अपना लहू वतन के नाम किया तो आज हमें आज़ादी का ज़श्न हर साल मनाने का मौका मिलता है. आज शहीद-ए-आजम भगत सिंह का जन्मदिन है. 28 सितंबर, 1907 को लायलपुर ज़िले के बंगा में (अब पाकिस्तान में) उनका जन्म हुआ था. गुलाम भारत में पैदा हुए भगत सिंह ने बचपन में ही देश को ब्रितानियां हुकूमत से आज़ाद कराने का ख़्वाब देखा. छोटी उम्र से ही उसके लिए संघर्ष किया और फिर देश में स्थापित ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाकर हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूम लिया. वह शहीद हो गए लेकिन अपने पीछे क्रांत...

अंजना नाम का मतलब...

अंजना नाम का मतलब भागवान हानुमा की धुसर मां (हानुमान जी की मां) होता है।    हानुमान जी की मां होने की वज़ह से अंजना नाम के लोग को समाज में बहुत पसंद किया जाता हैं।         यह बहुत दयालु, किस्म के होते हैं लोगों की  मादत करने में सबसे पहले आगे आते हैं।

दहेज या शिक्षा

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कितना अच्छा हो अगर लड़के लड़कियों की शादी में दहेज की जगह लड़की की शिक्षा की डिग्री मांगने लगे तो माता पिता भी फीरीज, कूलर, फानीचर व घर का समान की चिंता न करके लड़कियों की शिक्षा पर ध्यान दें,.... ✍️✍️         जिसे बाल-विवाह, दहेज प्रथा जैसी कूप्रपराथाऔ    को भी रोका जा सकता है, सामाज में शिक्षा को भी बढ़ावा मिलेगा जिससे एक लड़की ही नहीं एक पूरा समाज शिक्षित होगा।,🙏🙏                             धन्यवाद 🖕✍️✍️ अंजना यादव ...

कविता "बेटी पर"

कन्या दान हुआ जब पुरा आया समय विदाई का,।। हंसी ख़ुशी सब काम हुआ था सारी  रस्म आदाई का। बेटी के उस कतर स्वर ने बाबुल। को झकझोर दिया,।। पुंछ रही पापा क्या तुमने सचमुच में छोड़ दिया। अपने आंगन की फुलवारी मुझको सादा कहा तुमने।। मेरे पल भर का रोना ,न  बिल्कुल सहा तुमने। क्या इस आंगन के कोने में मेरा कोई स्थान नहीं अब मेरे रोने का पापा आप को  बिल्कुल ध्यान नहीं। देखो अन्तिम बार देहरी लोग मुझे पुजवाते है आके पापा आप क्यों इन्हें नहीं धमकाते है नहीं रोकते चाचा ताऊ, भाइया से भी आस नहीं क्या है ऐसी  निशठुरता आता कोई पास नहीं। बेटी की बात सुन नहीं खड़ा रह सका पिता  उमड़ पड़े आंखों में आसूं बदहवास स दौड पड़ा कातर बछिया सी वह बेटी लिपट पिता से रोती थी जैसे यादों के अकश्रर आंसुओं से धोती रही मां को लगा मानो गोद से कोई सब कुछ छीन चला मेरे आंगन के फूल मानो कोई बीन चला।     धन्यवाद 😥😥😭😭😭 🙏

बेटियो को बोझ क्यों माना जाता है,

बारिश में बूंद की तरह होती है बेटियां... मां, बाप दुखी हो तो रोती है बेटियां...     टुटे हुये खिलौनो से खेलती हैं बेटियां... मगर शिकायत नहीं करती हैं बेटियां...  परिवार का बोझ ढोती है बेटियां... फिर भी ना जाने क्यों दुनिया वाले कहते हैं बोझ होती है बेटियां।....            धन्यवाद 🖕   अंजना यादव

हमारा समाज

हम एक ऐसे समाज में रहते जाहां सुन्दरता को रंग से देखा जाता है, शिक्षा को नम्बर से देखा जाता है,          और सम्मान पैसा देख कर दिया जाता हैं।                      आज की सच्चाई...

फिल्म समीक्षा

फिल्म का नाम रुका हुआ फैसला रुका हुआ फैसला जैसे की नाम से ही पता चलता है,यादि आप को कोइ फैसला लेने को बोल दिया जाये जिस बारे में फैसला लेना है आप न सहमत हैं न असहमत हैं और आप का एक फैसला किसी की जान ले सकता है तो ज्ञ आप क्या करेंगे? उसे बचा लेंगे या मरने देंगे??  लेकिन आज के समय में लोग सचाई नहीं जानते किसी की जिंदगी मोत का फैसला तुरंत ले लेते हैं। इसी पर आधारित फिल्म रुका हुआ फैसला बनाईं थी। यह फिल्म बासु चटर्जी साहब ने १९८६ में बनायी थी नाम भी नाम भी कहानी के अनुरूप रखा है।" एक रुका हुआ फैसला" काहानी कुछ ऐसी है एक जुगी झोडी में रहने वाले लड़के पर उसके पिता के कत्ल का इल्ज़ाम है हथीयर एक खूबसूरत सा पोकेट नाईट हैं और दो चश्मदीद गवाह है, एक बुढ़ा आदमी, और एक बूढ़ी  औरत  कत्ल का ,समय आधी रात जब सामने कि पटरी से टेरेन धडधाडाती जा रही थी और वह बूढ़ी औरत सामने, की बिल्डिंग से कत्ल  होता देख रही थी और बुढ़ा आदमी नीचे से झगड़ने की आवाज सुनाई दे रही थी इन दो सबूत के आधार पर लड़के को फांसी की सजा सुना दी गई है पर कहीं कोई शक सुबह बाकी न रह जाए इसलिए शहर के १२गणमानय लोगों की ज...

रण फिल्म की समीक्षा,

रण फिल्म , आशंकाओं पर सौ प्रतिशत  खरी है, फिल्म के किरदारों के नाम, निर्माता: शीतल विनोद तलवार,मधु मटेंना निर्देशक:राम गोपाल वर्मा संगीत कार:अमर मोहिले, धर्मराज भट्ट, संदीप पटिल, जयेश गांधी,बापी टुटुल , संजीव कोहली कलाकार: अमिताभ बच्चन, रितेश देशमुख, परेश रावल, मोहनीश बहल,नीतू चंद्रा,गुल पनाग, सुचित्रा कृष्णमूर्ति, रजत कपूर,संदीप, राजपाल यादव राम गोपाल वर्मा की फिल्म "रण"सबसे पहले तो पोलिटिकली गलत है और एक किस्म की बेईमानी से भरी है। मुख्या खलनायक उन्होंने इशारे से देश की सत्तासीन  पार्टी का नेता बताने की कोशिश की है और ईमान दार नेता हुड्डा और कोई नहीं विपक्षी पार्टी के जाने माने  एक ही नेता हैं। आतंकवाद के खिलाफ जिस कड़े कानून की तरफ इशारा किया गया हैं, उस का पक्षधर कोन है यह भी सब जानते हैं। हालांकि लोग ये भी जानते हैं कि असल  मुद्दा कडा कानून नहीं असल मुद्दा आतंकवादियों को पकड़ना हैं। जब पुलिस किसी अपराधी को मारती हैं, किस कानून के तहत? या  अनकाउटर कर दिया जाता है कि  धारा ?असल मुद्दा कडा कानून नहीं कतंगवादियो  को पकड़ में आना है। कसाब पर पोटा नहीं ...

लड़की की सोच??

"मैं  ने कभी नहीं सुना एक लड़की से   की वह अगले जन्म  में  एक लड़की  ही  बनना  चाहती हैं"          इस प्रकार का नहीं सुना    दुनिया की भयावान       सितिथी को जन्म देता है। मैं सभी माता पिता बेटी बेटे में भेद भाव ना करें दोनो को बराबर का अधिकार दे।     धन्यवाद 

हिन्दी दिवस पर नारा,

अब ,आ, आ, ई  है वो धाराये जिन्होंने ने मिल कर शब्द बनाये शब्द  नाद, लिपियों से कविरो ने कितने सुन्दर छंद बनाए अलंकार तथा श्रृंगार रसों से तुलसी जी के दोहे  मन को भाये आज चलो सभी इस पवृ हिन्दी को गर्व सम्मान से अपनाते।        हामारी हिन्दी भाषा को सत् सत् नमन                        धन्यवाद अंजना यादव ..

हिन्दी दिवस

हम सब की है अभिलाषा हिन्दी बने राष्ट्रीय भाषा, 14सितमबर को हर साल हिन्दी दिवस मनाया जाता है क्योंकि आज के दिन 14सितमबर 1949को संविधान सभा में मत हिन्दी को राजभाषा घोषित किया गया था। इस निर्णय के बाद हिन्दी को हर क्षे, में प्रसारित करने के लिए राष्ट्रीय प्रचार समिति वर्धा के अनुरोध पर 1953से पूरे  भारत में 14सि् ़़ को हिन्दी दिवस मनाया जाता है। 

कोरोनावायरस पर आधारित सामाजिक परिस्थिति,

माहामारी के चलते कितने लोगों का जीवन जीवना कठिन हो गया है बहुत से लोग बेरोजगारी से परेशान हैं। तो कुछ लोग भूख से बिलक कर मर रहे हैं ।सामाज की हर परिस्थिति का सामना गरीबो को ही करना पड़ता हैं। सरकार सुविधाएं उपलब्ध कराती है जिसका लाभ अमीरों को जल्द मिल जाता है। गरीब तो बस सुनता ही रहता है। हमें इन बातों पर ध्यान देना चाहिए और सरकार को नोटिस भेजकर उन्हें गारीबो के लिए अच्छी से अच्छी सुविधाओ की मांग और समाज में गरीब और अमीर जैसी बनी दीवार को खात्म कर समाज में दोनों को   बराबर का  अधिकार देना चाहिए। यह समस्या तभी हल हो जब समाज मे स्वर्थी मतलबी लोगो के अन्दर से स्वय के बारे मे न सोच कर पूरे समाज के बारे मे सोचना शुरु करेगे और हर जाति धर्म मजहब को भूट कर एकता की भावना लयेगे सब आपस मे भाई चारा निभायेगे ।         ..धन्यावाद           ....अजना यादव✍️✍️    धन्यवाद।

फिल्म समीक्षा

      दो बीघा जमीन दो बीघा जमीन फिल्म यह लोगों के जीवन और समाज के हालात को दर्शाती है यह फिल्म बदलते वक़्त और बदलते भारत के बारे में बताती हैं।  यह फिल्म 1953 में अयी थी इसके निर्माता निर्देशक बिमल रॉय जी है। फिल्म का मुख्य कीरदार एक समभू  नाम के किसान का हैं जिसकी जमीन हड़प कर एक  गांव का बड़ा जमीनदार उस पर मील बनना चाहता है। समभू  कोअपनी जमीन बचाने के लिए पैसे की जरूरत होती है वह पैसे जुटाने के लिए गांव से बाहर निकल कर कोलकाता चाला जाता है। वहां पर वह हाथ वाला रिक्शा चालाना शुरू करता हैं।  यह फिल्म रवीन्द्र नाथ टैगोर जी की कविता दूई बिघा  जोमीन  से प्रेरित होकर इसका नाम रखा गया हैं। किरदार,, समभू का किरदार निभाने वाले बाल शाहनी जी थे। समभू की पत्नी का किरदार निभाने वाली जानी मानी  अभीनेत्री नीरुपा रोय थी। बेटे के किरदार में नजर आते मास्टर रत्न कुमार। समभू के पिता के किरदार में दिखने वाले नाना पलसीकर । बूट पॉलिश करने वाले  के किरदार में दिखें जगदीश  और कुछ सीन में महमूद भी नजर आये जिन्होंने आगे चलकर  हिंदी फिल्मों मे...

कावीता

बोये जाते हैं बेट  उग जाती है बेटियां, खाद पानी बेटों को़ पर लहराती है बेटियां                स्कूल जाते हैं बेटे पर पढ़ जाती है बेटियां,                  मेहनत करते हैं बेटे पर अव्वल आती है बेटियां,             रूलाते है जब बेटे तब खूब हंसाती है बेटियां               नाम करें ना करें बेटे पर नाम  कमाती हैं बेटियां  जब दर्द देते हैं बेटे तब मरहम लगाती है बेटियां छोड़ जाते हैं बेटे तब  साथ नीभाती है बेटिया आशा रहती है बेटों से पर पूर्ण करती है बेटियां।                 😔👨‍🦰👩‍🦰👆🙏  धन्यवाद✍️ अंजना यादव

movie rivew

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