फिल्म समीक्षा
फिल्म का नाम रुका हुआ फैसला
रुका हुआ फैसला जैसे की नाम से ही पता चलता है,यादि आप को कोइ फैसला लेने को बोल दिया जाये जिस बारे में फैसला लेना है आप न सहमत हैं न असहमत हैं और आप का एक फैसला किसी की जान ले सकता है तो ज्ञ आप क्या करेंगे? उसे बचा लेंगे या मरने देंगे??
लेकिन आज के समय में लोग सचाई नहीं जानते किसी की जिंदगी मोत का फैसला तुरंत ले लेते हैं।
इसी पर आधारित फिल्म रुका हुआ फैसला बनाईं थी।
यह फिल्म बासु चटर्जी साहब ने १९८६ में बनायी थी नाम भी नाम भी कहानी के अनुरूप रखा है।"एक रुका हुआ फैसला"
काहानी कुछ ऐसी है एक जुगी झोडी में रहने वाले लड़के पर उसके पिता के कत्ल का इल्ज़ाम है हथीयर एक खूबसूरत सा पोकेट नाईट हैं और दो चश्मदीद गवाह है, एक बुढ़ा आदमी, और एक बूढ़ी औरत कत्ल का ,समय आधी रात जब सामने कि पटरी से टेरेन धडधाडाती जा रही थी और वह बूढ़ी औरत सामने, की बिल्डिंग से कत्ल होता देख रही थी और बुढ़ा आदमी नीचे से झगड़ने की आवाज सुनाई दे रही थी इन दो सबूत के आधार पर लड़के को फांसी की सजा सुना दी गई है पर कहीं कोई शक सुबह बाकी न रह जाए इसलिए शहर के १२गणमानय लोगों की जुरी को आखरी फैसला लेने की जिम्मेदारी दे दी जाती है उनकी हां या ना लड़के का मरा या जीया सकतीं हैं।,यह देखकर सब सोच में पड़ जाते हैं ऐसा फैसला लेना आसान भी नहीं है...एक गलत फैसला सालों तक आत्मा काचोटेगा और यह फिल्म देखने वाले भी जुरी की तरह फैसला लेने लगे होंगे।
यही पर इनसान की फिदरत दिखाई देने लगती हैं ११ जुरी मैंबर बिना फैसला व बिना डिस्कशन के लड़के को कातील मान लेते हैं... उनके लिए यह केवल एक काम हैं जिसे किसी तरह पिछा झुडा कर अपनी व्यस्त जिंदगी में लौट जाना है...
केवल एक जुरी मैंबर लड़के को बेकसूर मानता है और अपना वोट लड़के के पक्ष में देता है जब तक १२के१२मैबर एक तरफ नहीं होते तब तक कोई फैसला नहीं लिया जा सकता यही पर फैसला रुक जाता है और उस पर एक लम्बी गरमागरम बहस होने लगती है...
और यही बहस इस फिल्म का सबसे मजेदार पक्ष हैं की कैसे हम भेड चाल के गुलाम हैं कैसे एक व्यक्ति की मानसिक आसान रास्ता चुनने को तैयार रहती है और किस तरह हम अपने पुवृगहो से गृसत होकर किसी सिचवेशन में घटना को समझते बुझते है ।
बेहतरीन अभिनेता ओ की पुरी टोली इस फिल्म में बूढ़े खांसते अनु कपूर;जुबां लपलपा, कर बात करते हैं गुस्सैल पंकज कपूर ;धीर गंभीर किन्तु पक्षपाती जाहिर अबास और बेहद शालीन किन्तु सबसे मजबूत किरदार के रैना साहब....
जाहिर सी बात फिल्माकर तो कमाल फिल्म लोगों को अनंत तक बांधे रहती हैं छुरी के साथ यह। फिल्म देखने वाले लोगों को भी गिल्टी अनगिलटी के। दो दल में बांट देती हैं लौजिकल को कैसे पलटा जा सकता हैं कैसे विपक्षी दल को पक्षी दल में लाया जा सकता है किसी की बात सुनी व देखी बात पर विश्वास नहीं करना चाहिए कभी कभी इनपोसीब बात भी सच साबित हो सकती है इसका बेहतरीन इस्तेमाल इस फिल्म में किया गया हैं।
यह फिल्म हमें सीख देती हैं कभी कभी जो हम देखते हैं व लोगों की बात मान कर जीवन शरल रास्ता मान लेते ऐसा न करके हमें स्वयं फैसला लेना चाहिए।
धन्यवाद 🖕🙏🙏
धन्यवाद....🙏🙏
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