कोरोना महामारी फिर शिक्षा पर भारी?
कोरोना के कहर ने गरीबों को ही नहीं बल्कि उनके भविष्य को भी संकट में डाल दिया है । हजारो गरीब बच्चे इस वर्ष शिक्षा से वंचित हो चुके हैं। धीरे-धीरे पूरा साल फिसल गया है। लेकिन गरीब बच्चों की पढ़ाई की शुरूआत भी नहीं हो सकी है।
मार्च माह में स्कूलों में ताले पड़ने के बाद इनकी शिक्षा का द्वार भी बंद हो गया। शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत बामुश्किल दाखिला पाने वाले गरीबों के बच्चों को ऑनलाइन व्यवस्था से जोड़ा नहीं जा सका है। किताब खरीदने के पैसे न जुटा पाने वाले गरीब परिवार उन्हें एंड्रायड मोबाइल से पढ़ाई करा पाने में सक्षम नहीं हैं। ऐसे में स्कूल से दूर गरीबों के बच्चे शिक्षा की धारा से भी दूर हो गए हैं। जिले में विभागीय आंकड़ों के मुताबिक शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत वर्ष 2016 से अब तक लगभग 2300 बच्चों का दाखिला सरकारी व प्राइवेट स्कूलों में कराया गया है।
बता दें कि लम्बी दौड़-भाग और मशक्कत के बाद गरीब बच्चों का दाखिला स्कूलों में हो सका था। प्राइवेट स्कूल गरीबों के बच्चों को नि:शुल्क एडमिशन देने को तैयार नहीं थे। अधिकारियों की चौखटों पर धरने करने के बाद उनके बच्चों की शिक्षा के लिए विद्यालयों ने दरवाजे खोले थे। लेकिन किस्मत ने फिर झटका दे दिया। मार्च माह से शुरू हुए कोरोना काल में स्कूलों के दरवाजे क्या बंद हुए गरीब बच्चों की शिक्षा की राह ही बंद हो गई।
वर्तमान सत्र में गरीब बच्चों के लिए दम तोड़ चुकी शिक्षा व्यवस्था के लिए प्रोत्साहन राशि संजीवनी बन सकती थी। लेकिन अब तक अभिभावकों के खातों में पैसा भेजा नहीं जा सका है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत दाखिला पाने वाले बच्चों के अभिभावकों को शिक्षा के प्रोत्साहन के लिए पांच हजार रूपए विभाग की ओर से भेजे जाने थे। देरी का कारण जो भी हो, लेकिन यदि समय से प्रोत्साहन राशि मिल जाती तो शायद अभिभावक बच्चों की शिक्षा को वायरस के संक्रमण से बचा पाते।
Thank you,✍️✍️
Anjana yadav....
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