नही चाहिए
पास बिठा कर बडे प्यार
से बाबुल ने पूछा बिटिया से
क्या गुण खोजू
वर में तेरे
शर्माती
सकुचती बोली बेटी
नही चाहिए कोई
राम मुझे
सीता पर न
करके भरोसा
धोबी की बातो
मे आकर
लेली ली जिसने
अग्नि परिक्षा
न ही मुझको कृष्ण चाहिए
जिसने रुकमणी के होते
राधा संग रास रचाते
न ही लक्ष्मी जी की तरह
मै चरण दासी बन कर
रहना चाहती
हूं
न ही पांडव जैसे वीर कोई
हार जुए में दाव लगा दे
पति हो तो शिव जैसे
मेरे नाम से अपना नाम
अर्धनारीश्वर गर्व से बोले
रुप रंग बढकर जिसमे
नारी के प्रति सम्मान भरा
हो
पिता सन्न सुनते ही रह गये
पा कर बेटी धन्य हुआ हूं
बडे प्यार से गले लगा कर
छलक आयी नैनों की गगरी
रोम रोम भर गया गर्व से ...
Comments
Post a Comment